ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
वो अब बड़ी हो चुकी है-कविता

वो अब बड़ी हो चुकी है-कविता

वो मोहल्ले की गलियाँ 

जिन्हें अपने नन्हें क़दम से नापा करती थी, 

वो मकान की दीवारें 

जिस पर कलम से लकीरें खिंचा करती थी, 

वो माँ की बरनियाँ

जिससे मुरब्बा चुरा कर खाया करती थी, 

वो बाबा की कहानियाँ 

जिन्हें उनकी गोध में बैठ कर सुना करती थी,

अब उसे बहुत याद किया करते हैं, 

रोज़ अपने पास बुलाया करते हैं, 

वो अब बूढ़े हो चुके है, फिर भी 

धुँधली आँखों से इंतज़ार किया करते हैं, 

इस बात से अनजान है वह नादान सारे 

कि वो अब बड़ी हो चुकी है, 

गलियों की जगह अब चौड़ी सड़क पर दौड़ा करती है,

दीवारों पर खिंचे लकीरें कोई तो मिटा दिया करती है, 

बरनियों का मुरब्बा नहीं अब mexican खाया करती है, 

कहानियों को कम्प्यूटर पर केद रखा करती है, 

वो मासूम सी थी जो दोस्त उनकी 

मतलबी दुनिया में ढल चुकी है, 

वजूद अब भी ज़िंदा है कँही

मगर ख़यालों से वो बदल चुकी है, 

वो अब बड़ी हो चुकी है,

और वह अब बूढ़े हो चुके हैं, फिर भी 

धुँधली आँखों से इंतज़ार किया करते हैं,

अब भी उसे पहचाने की नज़र रखा करते है, 

मगर ख़ुद की पहचान अब वो भुला चुकी है,

क्यों की वो अब बड़ी हो चुकी है।

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