ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
त्याग-दो लघु कथाएँ
Mutter und Kind by Robert Noir (1864-1931)

त्याग-दो लघु कथाएँ

1. त्याग

“सोच ले एक बार और! बेटी है तेरी और तूने तो इसे अब तक अपने दूध का एक क़तरा भी नहीं पिलाया है।” रेशमा ने कहा।

वो अपने हाथों में सो रही उस बच्ची के मासूम चहरे को एक तक देखते हुए बोली “वेश्या की बेटी वेश्या ही कहलाती है रेशमा। माँ के साये में तो कड़ी धूप भी पिघल जाती है पर ये मासूम इस माँ के साये तले तिल-तिल जलेगी। ”

और बच्ची को पालने में डाल दोनो वँहा से जाने लगे। तभी बच्ची के बिलखने की आवाज़ आइ। दोनो के कदम रुक गए। रेशमा ने अपने साथी की तरफ़ देखा। उसकी एक आँख से आँसू सरकता हुआ चहरे के निचले छोर में जा लटकने लगा। उसके शरीर का रोम-रोम उस वक़्त पलट कर अपनी बेटी को सिने से लगा लेना चाहता था। उसके काँपते होंठ खुलने लगे थे। और दिल ज़ोरों से सिसकने लगा। उसकी चोली सिने के दूध से भीगने लगी थी।

उसने कस कर मुट्ठी बांधी और गला उठा असमां की तरफ़ आँखें फाड़ कर देखने लगी। मानो वो अपने निकले हुए आँसुओं को वापस ले लेना चाहती थी। होंठ सिल लिए थे उसने। तड़पते दिल की चीख़ को सिने में ही दबा उसने अपने कदम आगे बढ़ाए। उसके अंधेरे में ओझल होते ही रेशमा ने उस बच्ची की तरफ़ पलट कर देखा। तभी झूले के पास की दीवार पर लगा बल्ब जगमगा उठा। और रेशमा सर नीचे कर अंधेरे की तरफ़ चल पड़ी।

2. नियत

एक अनजान लाश पड़ी थी सड़क पर और उसके पास खड़े थे दो इंसान एक गरीब भूखा बच्चा और दूसरा टाई कोट पहना जेंटलमैन

एक की नज़र लाश के पास पड़े आधे खाये सेब पर थी। तो दूसरे की आधे खुले बैग में रखे पैसों पर

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