ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
सूर्यपुत्र कर्ण का अंतिम दान – महाभारत

सूर्यपुत्र कर्ण का अंतिम दान – महाभारत

“अरे !! कोई दानवीर इस धरती पर बचा है क्या ?” कपकपाता हुआ एक स्वर शांत वातावरण को चिरता हुआ कँही से आया सबने एक दम से मुख मोड़ा

एक वृध्द ब्राह्मण ने युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए अपने बेटे का शव ढूँढ निकाला था। परंतु अंतिम संस्कार करने के लिए पास धन नहीं था वह जीवित बचे बाक़ी योद्धाओं के पास जा चुका था सबके सामने वह वृद्ध पिता हाँथ फेला चुका था परंतु युद्ध के वातावरण में किसी ने भी उसकी पुकार पर ध्यान नहीं दिया था एक जगह भीड़ देख वह, वँहा आया जँहा हम सब खड़े थे योद्धाओं के घेरे में कौन सा महावीर अंतिम साँस गिन रहा था इस बात का उसे कुछ पता ना था वह घेरे के बाहर से ही चील्ला रहा था

अरे !! कोई दानवीर आज इस धरती पर बचा है क्या ?” उसका कण्ठ डगमगा रहा था हाँथ में पकड़ी लाठी काँप रही थी

उसके काँपते स्वर जैसे ही घायल कर्ण के शून्य होते कानों पर पड़े, उसकी दिव्य आत्मा क्षण भर में द्रवित हो उठी। उसका शरीर उस वृद्ध के पुकार से काँपने लगा। वह अपने पुत्र चित्रसेन की ओर देखता हुआ टूटते स्वर में बोला “चि… त्र…  सेन… याचक…”

चित्रसेन झट से घेरे से बाहर निकल उस वृद्ध ब्राह्मण का हाँथ पकड़ उसे अंदर ले आया और अपने पिता के सामने खड़ा कर दिया।

“बोलो , ब्राह्म…ण, आज्ञा।” कर्ण ने उस वृद्ध से काँपते हुए होंठ से कहा।

उस महावीर के गले में घुसे तीर और कण्ठ से निकलते रक्त को देख वृद्ध अपने पुत्र के दुखद निधन को भूल गया। विनम्रता से बोला “कुछ नहीं! अंगराज, कुछ नहीं !” उस वृद्ध ने अनेक बार कर्ण से दान लिया था। वह इस घायल स्थिति में, मृत्यु संया में लेटे कर्ण से अब कुछ और नहीं माँग सकता था।

यही ठीक समय था जब कि मैं कृष्ण आस पास खड़े पाण्डवों को प्रथम कोन्तेये को दिखा सकता था। इसी समय पाण्डवों को लोकिक और कर्ण को परलोकिक श्रेष्ठव दिया जा सकता था।

मैंने आगे बढ़ कर कर्ण के कान में कहा “ इस वृद्ध के पास अपने पुत्र के अंतिम संस्कार के लिए पर्याप्त धन नहीं है। इसलिए यह एक दानवीर को ढूँढ रहा है।”

मेरे शब्द सुन उसने एकदम से अपनी आँखें बंद कर ली। उसका शरीर झटपटाने लगा। विवशता में दोनो मुट्ठियाँ बंद करने लगा। उस वृद्ध को क्या दान दिया जाए उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसकी साँसे भरने लगी।

क्या करेगा वह अब ? उसकी दानवीरता अंतिम समय में कलंकित होने जा रही थी। आस पास के योद्धाओं के शरीर में लोह कवच और शास्त्रों के अलावा कुछ भी नहीं था। सोने के मुकुट शेष थे, पर वह पाण्डवों ने मस्तकों पर थे।

उसका झटपटाता शरीर एक दम से रुक गया। कुछ निश्चय कर उसने आँखें खोली। एक अद्वितीय तेज उफन कर उनसे बाहर आ रहा था।

“चित्रसेन पाषाण” उसने चित्रसेन को आज्ञा दी। चित्रसेन एक पाषाण उठा ले आया। चित्रसेन को सामने देख उसकी निली आँखें तेज में चमकने लगी।

वह शक्ति एकत्रित कर बोला “ चित्रसेन उस पाषाण से मेरे मुख के… सुनहरे दाँत को तोड़… तोड़कर उस याचक को… को दे दो।” कण्ठ पर लगे हुए तीर के कारण होने वाली यातना को रोकने के लिए उसने आँखें मूँद ली।

चित्रसेन काँपने लगा। इस अंतिम समय में अपने पिता के चरणो पर पुष्प चढ़ाने के बजाए वह यह कठिन कर्म कैसे कर सकता था।

“चित्रसेन!” कर्ण का स्वर कठोर हो गया। “तुमको… तुमको कौरवों के सेनापति की यह आज्ञा है।” उसकी आवाज में अधिकार की अद्भुत तीव्रता थी। उसकी आज्ञा का उल्लंघन आस पास खड़ा कोई योद्धा नहीं कर सकता था।

आस पास खड़े लोगों को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। सबकी डबडबायी हुई आँखें चित्रसेन पर स्थिर हो गयी। वह अब भी पाषाण थामे काँप रहा था। एक ही स्थान पर जकड़ गया था। 

“चित्रसेन” कर्ण के होंठ अब थरथराने लगे थे। आँखें आग बरसाने लगे थे। वह क्रुद्ध हो अपने पुत्र की ओर देखने लगा।

चित्रसेन झटपट आगे बढ़ा। जैसे देह पर बिजली गिर पड़ी हो। चित्रसेन को आगे बढ़ते देख कर्ण की आँखें आनंद से चमकने लगी। उसने मुख खोल अपने दो स्वर्ण दाँत चित्रसेन को दिखाए।

चित्रसेन ने हृदय कठोर कर पाषाण को ऊँचा उठाया। सबने आँखें मूँद ली।

खाड! खाड! दो ध्वनि कुरुक्षेत्र की भूमि पर गूँजी। पाषाण दूर फ़ेक कर ना रुकने वाली सिसिकी को रोक चित्रसेन घेरे को तोड़ बाहर की तरफ भागा। वह जनता था उसकी सिसकियाँ उसके वीर पिता को अच्छी नहीं लगेगी।

उस दानवीर के सुंदर स्वर्ण दाँत टूटकर उसी के मुख में गिर गए। उन दाँतों के जड़ों से निकलने वाला रक्त उसके गालों से होता हुआ कण्ठ के घाव के रक्त से मिलने लगा। वँहा खड़े योद्धाओं के अश्रु भी बाहर निकल बहने लगे। बाएँ कष्ट से उसने दातों को बाहर निकाल अपने हाँथों में लिए। उसकी उसकी आँखें विलक्षण तेज़ से दीप्त होने लगी।

वह टूटे फूटे स्वर से कहने लगा “ब्राह्मण यह दान रक्तसंचित है। यह अपवित्र दान तुम्हारे पवित्र हाँथ में कैसे रख दूँ ?” एक बार फिर सब रोमांचित हो गए।

दाँतों में लगे रक्त को कैसे मिटाया जाए यह समझ ना आने के कारण वह एक बार फिर असहाय हो गया।आँसुओं की धारा उसके नयन से बाहर निकल बहने लगी।  उसने आसमान पर विधमान अपने पिता की ओर देखा।दूसरे ही क्षण एक अदभुत सोच उसे संचेत करने लगा।

आँसुओं की धारा में उसने दाँतों को पकड़ लिया। आँखों केआँसुओं की धारा रुके ना इसलिए वह एकटक सूर्यबिंब की ओर देखते ही रहा।

उसके स्वर्ण दाँतों में लगा रक्त उसके विशुद्ध आँसुओं में बह गया। दाँत स्वच्छ हो गए। सूर्या की किरणो में चमकने लगे। यह देख वह आनंदित हुआ।

कलाई पर बंधी रजनीगंधा की माला से एक फूल तोड़ उसने दाँतों पर रखा। वह दान को अपने भव्य माथे से लगा उसने हँसते हुए अपने हाँथ को ऊँचा किया। याचक को दान देने के लिए अब वह दान सर्व-विधिपूर्ण दान हो गया था।

जगत में बहुतों ने दान दिया होगा पर मृत्यु के द्वार पर इतना हृदय थरा देने वाला अद्वितीय दान केवल एक ही दे सकता था और वह था- प्रथम पाण्डव, राधेय, सूर्यपुत्र कर्ण ।

आस पास खड़े सभी मुखों से सहज बाहर निकला “ धन्य! धन्य!”

काँपता हुआ वह वृद्ध आगे बढ़ा। अब उसे दान स्वीकार करना ही था। काँपते हुए हाँथों से उसने दान ग्रहण किया। वृद्ध के नयन से निकलते अश्रु उन स्वर्ण दाँतों पर गिरे। उस वृद्ध याचक को वन्दन करने कर्ण गर्दन झुकाने लगा। परंतु कण्ठ पर लगे बाण की वजह से वह झुक नहीं पाया। वृद्ध से रहा नहीं गया, वह बोला “ दानवीर कर्ण! जिसने तुम्हें जन्म दिया वह माता धन्य है। जिस भूमि पर तुम्हारी विशाल हृदया देह पली है वह भूमि धन्य है। दानवीर कर्ण आर्यावर्त में तुम जैसा दानवीर ना हुआ है ना भविष्य में होगा।” उसके कथन में कसक भारी हुई थी। बहते अश्रुओं को रोकता हुआ वह वृद्ध अनुपम दान को ले कर अपने पुत्र मृतदेह की ओर जाने को मुड़ा।

उसको संतुष्ट लौटते हुए देख कर उस दानवीर के मुख पर एक हँसी की रेखा खिच गई। 

अर्जुन के हाँथ में गांडीव और भीम के कंधे में रखी हुई गदा अब काँप रही थी। इतनी असीम सहनशीलता देखकर भी वे यह नहीं जान पा रहे थे कि  कर्ण सूतपुत्र नहीं था। 

सूर्यपुत्र कर्ण का यह अंतिम दान देख मैं मंत्र मुग्ध हो गया था। मेरा यह विचार सही था। इस युग का वह सर्वश्रेष्ठ पुरुष था। 

***

*दानवीर कर्ण के अंतिम दान की कई कथाएँ है। एक कथा के अनुसार श्री कृष्ण स्वयं ब्राह्मण का रूप धारण कर कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने आते हैं। तो किसी कथा के अनुसार इंद्र देव या यम वृद्ध का रूप लेकर परीक्षा लेने आते है।

*यह कथा शिवाजी सावंत की किताब “मृत्युंजय” से प्रेरित है। हालाँकि इस किताब से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। परंतु इस घटना का चित्रण मुझे बहुत सजीव लगा।

PC: https://www.deviantart.com/paganflow/art/Karna-431535192 

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