ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
श्री विष्णु को नारदमुनि ने क्यों श्राप दिया?-शिव पुराण

श्री विष्णु को नारदमुनि ने क्यों श्राप दिया?-शिव पुराण

एक समय की बात है

भगवान विष्णु के भक्त नारदजी, जो ब्रह्माजी के पुत्र है। उन्होंने तपस्या करने का मन बनाया तपस्या के लिए उन्होंने कैलाश पर्वत पर गंगा नदी के पास ही एक गुफा को चुना नारदजी की तपस्या में लीन होने की बात इंद्र को पता चली इंद्र यह सोच चिंतित होने लगे कि ‘यह नारद मेरा राज्य लेना चाहता है इसलिए तपस्या कर रहा है’ इंद्र ने नारदजी की तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव को भेजा कामदेव ने अपनी सारी कलायें रच डाली पर उनका नारदजी पर कोई प्रभाव ना पड़ा

यह वही जगह थी जँहा भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था जब देवताओं ने उनसे कामदेव को फिर से जीवित करने की प्रथाना की थी तब भगवान शिव ने कहादेवताओं! कुछ समय व्यतीत होने के बाद कामदेव जीवित हो जायँगे परंतु यँहा उनका प्रभाव कभी नहीं पड़ेगा यँहा खड़े हो कर लोग चारों ओर  जितनी दूरी तक देख पाएँगे वँहा तक काम देव के बाणों का प्रभाव नहीं हो चलेगा

नरदमुनि, shailism, विष्णु

नारदजी ने उस जगह चिर काल तक तपस्या किया तपस्या ख़त्म कर उन्हें ख़ुद पर गर्व होने लगा गर्व इस बात का कि कामदेव पर उन्होंने विजय पा ली है शिव की माया से मोहित होने के कारण उन्हें सही बात का स्मरण नहीं रहा

काम विजयी की बात बताने वह तुरंत कैलाश गए और शिव को प्रणाम कर सारा वृतान्त सुनाया सब सुन भगवान शिव ने नारदजी (जो काम विजयें के सही कारण को नहीं जानते थे और विवेक खो बैठे थे।) से कहामुनि तुम विद्वान हो फिर भी मेरी यह बात सुनो तुमने जो वृतान्त मुझे बताया वह फिर किसी ओर से ना कहना विशेषत: श्री विष्णु से तो कदापि नहीं यह मेरी शिक्षा भी है और आज्ञा भी

परंतु शिव की माया से मोहित नारदजी ने इस शिक्षा को अपने लिए हितकर माना और वो ब्रह्म लोक गए वँहा उन्होंने काम देव पर विजयें की सारी बात अपने पिता ब्रह्म को बताया ब्रह्माजी ने भी नारदजी को यह सब किसी ओर को बताने से मना किया उनकी बात को भी अनसुना कर नारद जी वैकुण्ठ चले गए भगवान विष्णु ने उनका स्वागत सत्कार किया और वँहा आने की वजह पूछी गर्व से भरे नारदजी ने अपने काम विजयें होने की कथा अभिमान से विष्णु जी के सामने रखी विष्णु जी ने सही बात पूर्ण रूप से जान लिया

उसके बाद विष्णु जी ने कहानारद तुम धन्य हो और अनेक बातें कह नारद जी की प्रशंसा कीश्री हरी की बात सुन नारद जी ज़ोर ज़ोर से हसें और भगवान को प्रणाम कर वँहा से चले गए

तब नारदजी के जाते ही विष्णु जी ने अपनी माया प्रगट की उन्होंने मुनि के रास्ते में एक विशाल नगर की रचना की श्री हरी ने उसे अपने वैकुण्ठ नगर से भी अधिक सुंदर बनाया वह नगर चारों ओरों से लोगों से भरा पड़ा था वँहा शिलनिधि नामक राजा का राज्य था वे अपनी पुत्री का स्वयमवर करवा रहे थे नारद जी उस नगर को देख मोहित हो गए वे राजा के द्वार पर गए राजा ने उन्हें आया देख उनका अभिनंदन किया और सिंहासन पर बिठायाउनकी पुत्री ने भी नारदजी का चरण अभिनंदन किया। राजा की पुत्री को देख नारदजी चकित हो गए और बोले “राजन यह सुंदर कन्या कौन है।”

राजा “यह मेरी पुत्री है। इसका नाम श्रीमती है। यह अपने वर के चुनाव के लिए स्वयमवर में जाने वाली है। कृपया इसका भाग्य बताइए।”

नारदजी “इस लक्ष्मी के सामान कन्या को, विष्णु जी के सामान सुंदर और वैभवशाली वर मिलेगा।” ऐसा कह नारदजी वँहा से चले गए और तुरंत वैकुण्ठ वापस लौटे। वँहा उन्होंने विष्णु जी को स्वयमवर की बात बताई और कहा “हे हरी मैं उस कन्या से विवाह करना चाहता हूँ। मैं आपका प्रिया सेवक हूँ। कृपया अपना स्वरूप मुझे दे। जिससे वह राजकुमारी मुझे ही अपना वर चुने।

विष्णु जी ने मुस्कुराते हुए नारदजी की बिनती सुन ली। उन्होंने नारदजी को अपने जैसा प्रतीत होने वाला शरीरि तो दिया। किंतु मुख वानर का दे दिया।

नारद जी यह समझे की अब वो भगवान हरी से दिख रहे हैं और हर्ष से तुरंत स्वयमवर में जा पहुँचे। उन्होंने सोचा कि राजकुमारी मेरे इस विष्णु के रूप को देख आकर्षित हो जायगी और मुझे अपना वर चुन लेगी।

किंतु नारद जी का यह कुरूप रूप सिर्फ़ वह कन्या ही देख सकती थी। बाक़ी सभा के लोगों को नारद जी स्वयं के रूप में ही दिख रहे थे।

नारद जी के पास दो लोग बैठे थे जो शिवजी के पार्षद गण थे। शिवजी ने उन्हें नारदजी की रक्षा के लिए भेजा था। वह भी नारदजी का वानर रूप देख सकते थे। दोनो पार्षदों ने मुनि को देख उनकी हँसी उड़ाईं पर काम वेग में चित नारदजी ने उसे नज़रंदाज कर दिया।

कन्या सोने की वरमाला ले सभा में आइ। और एक-एक राजकुमारों के पास से होते हुए वह नारदजी के पास पहुँची। नारदजी का कुरूप रूप देख वह कुपित हो गई और वँहा से चली गई। राजकुमारी को सभा में उपस्थित लोगों में से एक भी वर पसंद ना आया। तभी विष्णु जी एक राजकुमार का रूप ले सभा में आए। उन्हें देखते ही राजकुमारी का मन खिल उठा और उसने माला उनके गले पर डाल दिया। विष्णु जी राजकुमारी को ले अंतरधान हो गए।

नारद जी निराश हो लौटने लगे तभी शिवजी के दोनो पार्षदों ने उनका उपहास करते हुए उन्हें आइना देखने के लिए कहा। आइना देखते ही नारदजी क्रोधित हो गए और उन दोनो पार्षदों को श्राप दिया “ तुम दोनो ने मुझ ब्राह्मण का उपहास उड़ाया है। अतः तुम ब्राह्मण वीर्य से उत्पन हुए अशुर होगे। ब्राह्मण की संतान होने पर भी तुम्हारा आकर अशुर जैसा होगा” उन दोनो शिव गणो ने नारद जी से कुछ नहीं कहा।वह उदासीन हो अपने स्थान को चले गए और शिव की आराधना करने लगे।

नारद जी माया में मोहित विष्णु लोक पहुँचे। क्रोध में अग्नि के सामान तपते हुए उन्होंने श्री विष्णु से कहा “हरे! तुम बड़े ही दुष्ट कपटी हो। तुम मायावी हो तुम्हारा अंत:करण मलिन है। तुमने ही मोहिनी का रूप धारण कर अशुरों के साथ छल किया था। आज तुमने मेरे साथ छल किया है। आज मैं तुम्हें सिख दूँगा और कहा “विष्णु जिस तरह तुमने मुझे एक स्त्री के लिए व्याकुल किया है। तुम भी उसी तरह स्त्री के लिए व्याकुल होगे। तुम वही स्वरूप में मनुष्य योनि में जन्म लोगे जिस स्वरूप को धारण कर तुमने उस राजकुमारी को आकर्षित किया था। और तुमने जिन वानरों के समान मेरा मुँह बनाया था वही वानर उस समय तुम्हारी सहायता करंगे। तुम स्त्री विरह में भटकोगे और अज्ञान मनुष्यों के सामान तुम्हारी स्थिति होगी।”

शिव, Shailism, विष्णु

अज्ञान से मोहित जब नारद जी ने माया के वस में हरि जी को यह श्राप दिया तब उन्होंने शिवजी की माया की प्रशंसा करते हुए श्राप को स्वीकार किया। उसके बाद शिव जी ने अपनी माया नारदजी से खिच ली। माया से निकलते ही नारद जी की बुद्धि फिर से शुद्ध हो गई। उन्हें पूरी घटना का ज्ञान प्राप्त हो गया। उन्हें बहुत पश्च्ताप हुआ। वो श्री विष्णु के चरणो में गिर क्षमा माँगने लगे।

विष्णु जी ने उन्हें उठा कर मधुर वाणी में कहा “तात खेद ना करो तुम मेरे प्रिय भक्त हो इसमें संशय नहीं। किंतु तुमने गर्व में आकर शिवजी की बात नहीं मानी थी अब वो ही तुम्हारा कल्याण करंगे। तुम ब्रह्म लोक जाओ और अपने पिता से शिव तत्व का ज्ञान लो।”

नारदजी श्री विष्णु से विदा ले ब्रह्मलोक चले गए।

*यह कथा शिव पुराण के रूद्र संहिता के से ली गई है।

*इस कथा को संक्षिप्त कर सरल शब्दों में बताने का प्रयास किया गया है।

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