ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
श्री गणेश का वाहन मूषक क्यों है? (गणेश चतुर्थी)
http://www.pictorem.com/8799/GANAPATHY%20MURAL.html

श्री गणेश का वाहन मूषक क्यों है? (गणेश चतुर्थी)

संसार में शायद ही ऐसा कोई शिव मंदिर होगा जँहा नंदी जो कि शिव के वाहन भी है और उनके गण के अध्यक्ष भी की मूर्ति ना हो उसी तरह श्री गणेश की मूर्ति के पास ही उनके वाहन मूषक की भी स्थापना की जाती है।अखिर यह मूषक श्री गणेश का वाहन कैसे बना इसके पीछे दो कहानियाँ है जिसका वर्णन इस तरह है :

1 कौंच गंधर्व

देव लोक में दवताओं के राजा इंद्र का दरबार सज़ा हुआ थादेवताओं, ऋषीयों, गंधर्वों और अप्सराओं से भरे इंद्र के इस दरबार में किसी विषय पर वार्तालाप हो रहा था। दरबार में उपस्थित सभी लोग गम्भीर मुद्रा में थे सिवाय एक गंधर्व के जिसका नाम था कौंच। कौंच अप्सराओं के साथ हँसी ठिठोलि करने में व्यस्त था। उसे दरबार की गम्भीरता और अनुशासन का भी भान नहीं रहा। इंद्र कोंच के इस संभव से क्रोधित हो उठे और उन्होंने श्राप दे उसे मूषक में बदल दिया।

शरीर तो बदल चुका था पर स्वभाव अब तक चंचल और उदंड था उस मूषक कौंच का। उसने पूरी स्वर्ग नगरी को उथल पुथल करना शुरू कर दिया। परेशान इंद्र ने उस मूषक को स्वर्ग से बाहर फेंकवा दिया। वह पृथ्वी पर पराशर ऋषि के आश्रम के पास गिरा। मूषक ने आश्रम में भी उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया।

उन्ही दिनो पराशर मुनि के यँहा श्री गणेश आए हुए थे। पराशर मुनि ने उन्हें मूषक की बात बतलाई। श्री गणेश ने उस मूषक को पकड़ने का निर्णय किया और एक पाश उसके पीछे छोड़ दिया। मूषक उस पास से बचने के लिए पाताल लोक में जा घुसा। पर अंत में पकड़ा गया और मूर्च्छित हो गया। गले से जकड़ वह पाश उसे घसीटता हुआ श्री गणेश के सामने ले आया। मुर्च्छा खुलते ही कौंच मूषक श्री गणेश से क्षमा याचना करने लगा।

श्री गणेश ने कहा “तूने ब्रह्मण्डो को बहुत कष्ट दिया है। पर तू अब मेरी शरण में है इसलिए तू जो चाहे मुझसे माँग ले”

यह सुनते ही मूषक का अभिमान जाग उठा और उसने कहा “मुझे आपसे कुछ नहीं माँगना किंतु आप जो चाहो मुझसे माँग लो।”

मूषक की बात सुन गणेश जी हँसे और कहा “ठीक है फिर तू मेरा वाहन बन जा।”

कौंच ने यह स्वीकार कर लिया। किंतु जैसे श्री गणेश उस पर सवारी करने बैठे वह उनके भार से दबने लगा। जल्द ही उसका अभिमान टूट गया और उसने एक बार फिर श्री गणेश से याचना करते हुए कहा “प्रभु मैं आपके वज़न से दबा जा रहा हूँ। कृपया कुछ ऐसा करें की मैं आपके भार को उठा सकूँ और वाहन के रूप में आपकी सेवा करने में भी समर्थ हो जाऊँ।”

श्री गणेश उसकी बात से प्रसन्न हुए और अपने शरीर का भार उन्होंने कम कर दिया। और इस तरह मूषक जिसका नाम कौंच था और जो एक गंधर्व था श्री गणेश का वाहन बना।

2 गजमुख़ासुर असुर

गजमुख़ासुर नामक असुरों का एक राजा हुआ करता था। वह बहुत बड़ा ही शिव भक्त था। एक दिन उसने वरदान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की तपस्या करने का निर्णय लिया और एक जंगल में जा घोर तपस्या करने लगा। तपस्या कठिन थी। उसने पानी और भोजन का भी त्याग कर दिया था। बहुत वर्ष बीत गए। एक दिन उसकी इस कठिन तपस्या से प्रसन्न हो भगवान शिव ने उसे दर्शन दिया और वरदान माँगने के लिए कहाँ। कई शक्तियों के साथ उसने किसी भी अस्त्र शस्त्र ने ना मारे जाने का वरदान माँग लिया। भगवान शिव ने उसे वरदान दे दिया।

वरदान ले वह अपने राज्य पहुँचा और कुछ ही दिनो ने भीतर उसने देव लोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्र और बाक़ी देवताओं का उसे रोक पाना असम्भव हो गया। वो सारे भगवान शंकर के पास सहायता माँगने पहुँचे। भगवान शिव ने श्री गणेश से देवताओं की सहायता करने के लिए कहा।

श्री गणेश अपने पिता से आज्ञा ले युद्ध स्थल पर पहुँचे और गजमुख़ासुर से युद्ध करने लगे। दोनो ही के बीच भयंकर युद्ध हुआ। श्री गणेश ने कई अस्त्रों का प्रयोग किया पर वरदान के कारण सब विफल रहा। अंत में श्री गणेश ने अपना एक दंत तोड़ा और उससे गजमुख़ासुर पर प्रहार किया। असुर प्रहार से तिलमिला उठा। अपने प्राणो की रक्षा के लिए वह घबरा कर मूषक बन भागने लगा। पर श्री गणेश ने उसे अपने पाश में बाँध लिया। गजमुख़ासुर ने श्री गणेश से अपने जीवन की क्षमा माँगी। श्री गणेश ने उसे जीवन दान दे दिया और अपना वाहन बना लिया।

*कई कथाओं के अनुसार श्री गणेश का दंत भगवान परशुराम  के परशु के प्रहार से टूटा था।

 

Leave a Reply

Close Menu
%d bloggers like this: