ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शैलपुत्री के जन्म का रहस्या-नवरात्रि

शैलपुत्री के जन्म का रहस्या-नवरात्रि

शिव का अपमान 

विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र समेत सारे देवता वँहा उपस्थित थे। ऋषियों, ब्रह्मणो और राजाओं से मंडप भरा हुआ था। राजा दक्ष के विष लिप्त बाण रूपी शब्द सती की आत्मा को छेदे जा रहे थे। वो पिता थे किंतु भरी सभा में अपनी पुत्री के पति का अपमान करने का अधिकार उन्हें नहीं था।

सती ने विष्णु और ब्रह्मा की ओर देखा, वो शीश झुकाए हुए थे। इंद्र और समस्त देवता गण जो हर छोटी-बड़ी विपती में उनके पति शिव के पास सहायता माँगने आ जाते थे। वो भी चुप-चाप अपने स्थान में बैठे सब सुन रहे थे।

सती की सहन शक्ति अब टूट चुकी थी। उनकी आत्मा में अब एक भी ऐसा स्थान शेष नहीं था जँहा वो अपने पिता के कटु शब्दों को झेल पाती।

मंडप के बीचों-बीच जा कर सती खड़ी हो गई। उन्होंने हाँथ जोड़े और अपने पति शिव से क्षमा माँगते हुए स्वयं को योगाग्नि से प्रज्वलित कर लिया। अग्नि के लव की ताप प्रचंड थी। किंतु सती उस तप में शांत खड़ी थी। क्योंकि पति के अपमान की पीढ़ा के सामने यह अग्नि का यह ताप शीतल मालूम पड़ रहा था।

वह दृश्य इतना भयानक था की वँहा उपस्थित समस्त लोगों की आत्मा सूखे पत्ते की तरह काँपने लगी थी। और इस घटना के परिणाम के आभास मात्र से उनका शरीर स्वयं के प्राण त्यागने को व्याकुल हो रहा था।

सती के अग्नि में विलीन होते ही हिमालय के कैलाश पर्वत में योग में लीन बैठे शिव के शरीर में एक त्रिव विधुत का आघात हुआ। उनके शरीर की हर एक नस तन गई। भवें त्रिशूल की तीखी हो गई। कंठ का विष उबलने लगा और उनकी ज्वाला सी भड़कती आँखें खुली। 

सती का पुनः जन्म 

शैलपुत्री के रूप में सती ने फिर से जन्म लिया। राजा हिमालय की पुत्री होने की ही कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। शैलपुत्री ही पार्वती के नाम से जानी जाती है। और उन्होंने असम्भव तप कर फिर से शिव की प्राप्ति की या फिर यह कहें की शिव में अपनी सती को फिर से प्राप्त किया।

*उपनिषद के अनुसार शैलपुत्री ने इंद्र और समस्त देवताओं के घमंड को तोड़ डाला था। देवताओं ने लज्जित हो उनके सामने झुक कर कहा “कि आप ही शक्ति हो, हम सभी- ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपसे ही शक्ति प्राप्त करते है। आप ही हमारी शक्ति का स्त्रोत हो।”

*शैलपुत्री को मूलाधार चक्र ही देवी भी मना जाता है। योग में इंद्रियों को जागृत करने की क्रिया का प्रारम्भ मूलाधार से होता है। योगी इस क्रिया के प्रारम्भ में सबसे पहले मूलाधार चक्र पर ही ध्यान लगाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे नंदी पर बैठ शैलपुत्री मूलाधार से अपनी यात्रा आरम्भ करती है। अपने पिता से शिव (जागृत शक्ति) तक की यात्रा। उनके शिव को खोजने या पाने की यात्रा।

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