ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
महाभारत का वह कुत्ता और पांडवों की अंतिम यात्रा
Illustrations from the Barddhaman edition of Mahabharata

महाभारत का वह कुत्ता और पांडवों की अंतिम यात्रा

महाभारत कथा

श्री कृष्ण की मृत्यु और यदुवंशियों के नाश की जानकारी प्राप्त कर युधिष्ठिर को बहुत दुःख हुआ। पृथ्वी पर पांडवों का कर्तव्य भी पूरा हो चुका था।इसलिए महर्षि व्यास की सलाह मानते हुए पांडवों ने स्वर्ग तक की यात्रा करने का निर्णय लिया।

युधिष्ठिर ने युयुत्सु को बुलाकर उसे संपूर्ण राज्य की देख-भाल का भार सौंप दिया और परीक्षित का राज्याभिषेक कर दिया। अपने मामा श्री कृष्ण तथा बलराम आदि का विधिपूर्ण तर्पण और श्राद्ध करने के बाद पांडवों व द्रौपदी ने साधुओं के वस्त्र धारण किए और स्वर्ग जाने के लिए निकल पड़े। इस यात्रा में युधिष्ठिर को एक कुत्ता मिला। वह कुत्ता भी चारों पांडवों और द्रौपदी के साथ युधिष्ठिर के पीछेपीछे चलने लगा

पांडव हिमालय तक पहुंच गए। हिमालय लांघ कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद उन्होंने सुमेरु पर्वत के दर्शन किए। पांचों पांडव, द्रौपदी तथा वह कुत्ता तेजी से आगे चलने लगे। तभी द्रौपदी लडख़ड़ाकर गिर पड़ी।

द्रौपदी को गिरा देख भीम ने युधिष्ठिर से पूछा कि “द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया। तो फिर क्या कारण है कि वह नीचे गिर पड़ी।”

युधिष्ठिर ने कहा “ द्रौपदी हम सभी में अर्जुन को अधिक प्रेम करती थीं। इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ है।” ऐसा कहकर युधिष्ठिर द्रौपदी को देखे बिना ही आगे बढ़ गए।

थोड़ी देर बाद सहदेव भी गिर पड़े। भीमसेन ने सहदेव के गिरने का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया कि “सहदेव किसी को अपने जैसा विद्वान नहीं समझता था। इसी दोष के कारण इसे आज गिरना पड़ा है।” कुछ देर बाद नकुल भी गिर पड़े। भीम के पूछने पर युधिष्ठिर ने बताया कि “नकुल को अपने रूप पर बहुत अभिमान था। इसलिए आज इसकी यह गति हुई है।”

और फिर अर्जुन भी गिर पड़े। युधिष्ठिर ने भीमसेन को बताया कि “अर्जुन को अपने पराक्रम पर अभिमान था। अर्जुन ने कहा था कि मैं एक ही दिन में शत्रुओं का नाश कर दूंगा। लेकिन ऐसा कर नहीं पाए। अपने अभिमान के कारण ही अर्जुन की आज यह हालत हुई है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर आगे बढ़ गए।”

थोड़ी आगे चलने पर भीम भी गिर गए। इस बार भीम के बिना ही पूछे युधिष्ठिर ने उसके गिरने का कारण बताया कि “तुम खाते बहुत थे और अपने बल का झूठा प्रदर्शन करते थे। इसलिए तुम्हें आज भूमि पर गिरना पड़ा है।” यह कहकर युधिष्ठिर आगे चल दिए। अब केवल वह कुत्ता ही उनके साथ चल रहा था

Mahabharat

युधिष्ठिर कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए स्वयं देवराज इंद्र अपना रथ लेकर आ गए। तब युधिष्ठिर ने इंद्र से कहा कि- मेरे भाई और द्रौपदी मार्ग में ही गिर पड़े हैं। वे भी हमारे हमारे साथ चलें, ऐसी व्यवस्था कीजिए। तब इंद्र ने कहा कि वे सभी पहले ही स्वर्ग पहुंच चुके हैं। वे शरीर त्याग कर स्वर्ग पहुंचे हैं और आप जीवित स्वर्ग में जाएंगे।

इंद्र की बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता मेरा परमभक्त है। इसलिए इसे भी मेरे साथ स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए। लेकिन इंद्र ने ऐसा करने से मना कर दिया। तब युधिष्ठिर ने कहा कि “मैं तभी स्वर्ग जाऊँगा जब यह कुत्ता मेरे साथ जाएगा

इंद्र ने कहा किस्वर्ग में बस मनुष्य ही प्रवेश कर सकते है और वो भी जो सच्चे और पाप रहित हो

युधिष्ठिरयह कुत्ता भी पाप रहित और पुण्य आत्मा है अगर ना होता तो यह भी पर्वत से कब का गिर चुका होता किंतु यह भी मेरे साथ जीवित स्वर्ग तक पहुँचा है और यही इसका प्रमाण है

तभी कुत्ते के रूप में यमराज अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए। वह कुत्ता कोई और नहीं बल्कि स्वयं यमराज(धर्मराज) ही थे।जिन्होंने युधिष्ठिर के धर्म की अंतिम परीक्षा लेने के लिए कुत्ते का रूप धारण किया था युधिष्ठिर को अपने धर्म में स्थित देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ में बैठाकर स्वर्ग ले गए।

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