ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शरीफ़ आदमी – हिंदी लघु कथा
Painting by Picasso

शरीफ़ आदमी – हिंदी लघु कथा

लघु कथा 

“आप तो उन गलियों को पहचानते है रोज़ का आना जाना है।”

“हाँ बहुत अच्छी तरह से।” अकड़ते हुए कहा।

“कहाँ-कहाँ का माल है वँहा पर?”

“बंगाल, बिहार, पंजाब समझ लो सारा हिंदुस्तान बिकता है वहाँ।”

“अच्छा!”

“और विदेशी भी।”

“आपने तो सारे माल चखें होंगे?” उत्सुक हो पूछा।

“देश के हर प्रदेश की नदी में डुबकी लगाई है भाई।” आँख मारते हुए “और विदेशी भी।”

मुझे भी विदेशी चमड़ी पास से देखनी है।

“बस देखोगे या फिर…” और ज़ोरों से हँसने लगा।

“डुबकी भी लगनी है…” कहते ही शरमा सा गया। “चलिए ना चलते है वहाँ।”

“अभी?”

“हाँ अभी!”

“बड़े उतावले हो रहे हो। पर अभी नहीं। दिन ढलने के बाद।”

“दिन ढलने के बाद क्यों? अभी चलने में क्या हर्ज है?”

“अरे भाई तुम समझते नहीं। मैं एक शरीफ़ आदमी हूँ।”

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