“खिलोने वाला”

काला था वो मगर,
रंग बेच रहा था,
नंगे पांव में छाले थे उसके मगर,
चकरी वाले पंख सोप रहा था,
नकाब भी थे उसके पास मगर,
चेहरे पर चढ़ा हुआ नहीं था,
खिलौनों से सजी दुकान थी उसकी मगर,
खेला उनसे कभी नहीं था,
जाना उसे भी था दूर कंही मगर,
वो राह पर हमेशा से अकेला ही खड़ा था,

काला था उसका जीवन मगर,
रंगीन एक दुनिया बेच रहा था…

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