ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
“इश्क़ की मिश्री” पाँच कविताएँ – Shailism

“इश्क़ की मिश्री” पाँच कविताएँ – Shailism

1. “बारिश” 

घर से निकलते ही,

यादों की जोरों से बारिश होने लगी,

छतरी मैंने साथ नहीं रखी थी,

पूरा ही भीग गया,

कुछ बूँदे मखमली चादर ओढ़े हुई थी  ,

तो कुछ काँटों सी चुभी थी जिस्म को मेरे….

2. “इश्क़ की मिश्री”

इश्क़ वाली दुकान से 

इश्क़ की मिश्री लाया था,

कुछ हिस्से में चींटी लग गई,

कुछ बेस्वाद सा हो गया,

अब उस दुकान की तरफ रुख नहीं मेरा…

3. “आदत”

इस बार कुछ अलग हुआ,

मेरी आदत ने मुझे छोड़ दिया,

वो आदत तुम थी।

बड़ा इठलाई थी ना मुझे छोड़ते वक़्त,

मैंने भी कम ना था,

मैंने तुम्हे बुरी आदत का नाम दे दिया।

4. “ख़ामोशियाँ”

दोनों काली मलमल ओढ़े

एक पहाड़ की चोटी पर

चुपचाप से बैठे थे,

शायद एक दूसरे की

ख़ामोशी बाँट रहे थे,

एक की ख़ामोशी थक चुके ज़ख्मों की थी,

तो दूसरे उस चाँद की खुद पर लगे दाग़ की थी…

5. “काली चादर”

हमने मिल कर जिस असमां पर 

चाँद तारें जड़े थे,

उस असमां ने काले बादलों की 

एक चादर ओढ़ ली है,

तो क्या हुआ,

कभी तो नींद से वो उठेगा,

कभी तो सूरज की गर्मी से

चादर में सिमटा वो पिघलेगा,

तब देखना उसकी तरफ,

हमारे चाँद तारें फिर चमकेंगे।

By Shailism 

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