ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
इला – एक नारी की अनक़ही कहानी
Painting by Raja Ravi varma

इला – एक नारी की अनक़ही कहानी

लघु कथा 

क्षितिज पर सूर्य देव की पहली किरण फूट चुकी थी। आधी सुख चुकी गोदावरी में खड़ी इला आँखे बंद कर उनको जल चढ़ा रही थी। सूरज की किरणे नदी के पानी से टकरा कर इला के शरीर में इंद्रधनुषि रंग बिखेर रही थी। उसके होंठों से निकलते मंत्रो की आवाज़ बहती हवा में गूँज रही थी। मुख मंडल सूर्य पिंड की तरह दमक रहा था। निर्मल, मनोहर, मंत्रमुकध कर देने वाला उसका देह सुबह की लालिमा में और खिल रहा था। गोदावरी सी ही पवित्र प्रतीत होती वह नारी सूर्य की अरधान में खोई हुई थी।

तभी इला के कानो को एक चीख़ सुनाई दी। बड़ी ही असामान्य थी वह चीख़। उस चीख़ से आसपास का सारा वातावरण काँप सा गया था। पक्षी उस जगह से उढ़ कर कँही और जाने लगे थे। मानो कोई भूचाल गया हो। इला गोदावरी से निकल जल्दबाज़ी में अपनी साड़ी को जैसेतैसे तपेट कर उस चीख़ की तरफ़ नंगे पाँव ही दौड़ पड़ी। उसके पैरों की गति के साथ ही चीख़ में दर्द का भाव भी तेज़ी से बढ़ रहा था।

वो चीख़ झाड़ियों के झुंड के पीछे से रही थी। जैसे ही इला ने झाड़ियों को हटा कर उस तरफ़ देखा उसका दिल मानो हलक में कर अटक गया हो। उसके मुख से आवाज़ के नाम पर बस ज़ोरों की साँसे निकलने लगी थी। आँखें पलक झपकना भूल चुकी थी। गोदावरी मानो आँसू बन कर टपक रही हो उसकी आँखों से। उसके पैर उस गीली मिट्टी में धसने लगे थे। वह दृश्य देख कर जिसमें एक औरत ज़िंदा जल रही थी। वह जलती लकड़ियों के ढेर पर खड़ी थी। वह कोशिश कर रही थी अग्नि की उन लपटों से बाहर कूदने की।पर चारों तरफ़ से उसे कुछ आदमियों ने घेर रखा था। बाँस की मदद से वो उसे ढकेल कर फिर चिता पर बिठा देते थे। वह चिता उसके पति की थी। उसके बाल पूरी तरह जल चुके थे उसके सर का चमड़ा साफ़ दिखाई देने लगा था। उसके शरीर का हर भाग धधक कर जलने लगा था। उसकी तिलमिलाहट से अग्नि भी शांत होने की कोशिश करने लगती थी। पर वो लोग तेल फ़ेक उसे और भड़का देते थे। उसके जलते शरीर के चमड़े की बदबू हवा में फैलने लगी थी। इला थरथराने लगी थी। और तभी उस जलती औरत के दोनो हाँथ इला की और उठे। इला ज़मीन पर गिर गई।

अगले ही पल इला ने अपनी सारी शक्ति अर्जित कर स्वयं को सम्भाला। और अपने क़दमों को पीछे खिंचते हुए नगर की तरफ़ भागने लगी। वह भागने लगी उस अत्याचार से दूर जिसे लोग सती प्रथा कहते थे। कँही दूर चुकी थी वो। पर वो चीख़ अब तक उसके कानो में सुनाई दे रही थी। उसने कस कर दोनो हाँथो से अपने कानो को बंद कर दिया। बिलखती बदहवास वो नगर के मुख्य द्वार पर पहुँची। द्वार पर पहुँच कर उसके क़दम धीमे हो गए। पर उसकी साँसे और धड़कने अब तक दौड़ रहे थे। उसकी नज़र दूर बने मंदिर पर गई। मुख्य मार्ग, मुख्य द्वार से सीधे मंदिर तक जाता था। बहते आँसुओं की वजह से इला को मंदिर धुँधला दिखाई दे रहा था। राजा इला ने इस नगर प्रतिष्ठाना (पैठण) को बसाते समय माँ दुर्गा के इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। दुर्गा का मुख, मुख्य द्वार की तरफ़ बनवाया था। ताकि आने वाली अपत्तियों से नारी शक्ति दुर्गा इस नगर की रक्षा करें। मुख्य मार्ग से कई और मार्ग निकलते थे। जो नगर के भिन्नभिन्न जगह तक जाते थे। कुछ कच्चे मार्ग नगर से दूर एक तरफ़ बने शुद्रों की बस्ती में जा कर मिलते थे। तो कुछ पत्थरों की सिल्लियों से बने मार्ग वेस्यों के बाज़ारों की तरफ़ बड़ते थे। कुछ मार्ग ब्रह्मणो के निवास की तरफ़ जा रहे थे। उन्ही में से एक मार्ग में मुड़ते हुए इला एक भव्य इमारत की सीढ़ियों पर जा कर गिर पड़ी। यह इमारत उसके पति, पैठण के मुख्य पुरोहित ब्रह्मानंद का था।

1650 में ब्रह्मानंद पैठण के सर्वोच पुरोहित बने थे। पिछले आठ वर्षों से वो ही पैठण के धर्मगुरु थे। नगर के बाक़ी पुरोहित यँहा तक की राजा भी उनसे धर्म और राजनीति का पाठ लिया करते थे।

वो सीढ़ियों पर चीख़ कर रोना चाहती थी। पर वह मुख्य पुरोहित की पत्नी थी। कोई उसे वँहा इस तरह बिलखता देखे इससे पहले वो घर के अंदर चले जाना चाहती थी। पर पैरों में कमज़ोरी चुकी थी। वो अब भी काँप रहे थे। सीढ़ियों के दोनो तरफ़ बने खम्बों का सहारा ले कर उसने ख़ुद को जैसेतैसे उठाया। पैरों में लगी मिट्टी के निशान फ़र्श पर बिछे मख़मली गलीचे पर छोड़ते हुए उसने घर पर प्रवेश किया। और उस कमरे की ओर बढ़ी जँहा तीन महीने की उसकी बेटी गहरी नींद में सो रही थी। कमरे के चौखट पर ही स्वयं को रोकते हुए, झूले पर झूलती उस नन्ही बच्ची को ममता से देखने लगी। दुनिया की रीतरिवाज से अनजान वो शायद सपनो के बग़ीचे में खेल रही थी। कितनी मासूम लग रही थी वो। उसकी मासूमियत में खोई इला को वो चीख़ फिर सुनाई दी। घबराते हुए वो अपनी बेटी की ओर दौड़ी। उसे झूले से उठा अपने सिने से लगा वो फिर बिलखने लगी।

दोपहर हो चुकी थी। इला अपने कक्ष पर बिछे बिस्तर पर बैठ अपनी बेटी के माथे को सहला रही थी। वो अपनी माँ के हाँथ के सोने के कंगन को अपने नन्हें हाँथों से पकड़ने की कोशिश कर रही थी। और जब वह उस कंगन को पकड़ लेती तो इला को देख कर मुस्कुराने लगती थी। इला भी उसे देख मुस्कुराने लगी थी। पर तभी वो चीख़ दीवारें भेद कर कमरे में गूँजने लगती। वो द्रश्य उसके आँखों के सामने जाता था। इला झट से आँख मूँद लेती और उसकी मुस्कान उसके होंठो से गिर कँही खो जाती थी।

बाहर से घुँघरुओं की आवाज़ कमरे की तरफ़ आते हुए सुनाई दे रहे थे। घुँघरू कमरे में पहुँच चुप से हो गए। पर इला को उनके कमरे में होने का आभास भी नहीं था।

दरवाज़े के पास खड़ी मितरा ने पुकारादीदी!”, पर मितरा की आवाज़ का इला पर कोई असर नहीं पड़ा। मितरा ने इला के बिस्तर के पास पहुँच कर फिर से कहादीदी!” इला ने आँखें खोल कर सामने देखा। सामने एक सोलहसत्रह साल की लड़की हाँथों में भोजन की थाली लिए खड़ी थी। उसकी नज़रें ज़मीन की ओर झुकी हुई थी। चहरे पर घबराहट के भाव थे। इला ने अपनी नज़र उस लड़की से हटा मितरा की तरफ़ घुमाया। मितरायह वैष्णवी है। पुरोहित जी की नई दासी।

इला मितरा को अनसुना करमुझे भूख नहीं है।

मितरापर दीदी आपने सुबह से कुछ नहीं खाया है। जब से सूर्य देव को पानी चढ़ा कर आइ हो इसी कमरे में बंद बैठी हो। क्या हुआ है आपको, तबियत तो ठीक है ना ?”

मितरा, इला के पिता के यँहा एक दासी की बेटी थी। इला की शादी के बाद उसे इला की देखरेख के लिए साथ भेजा गया था। वह इला के साथ बचपन से रही थी। उसलिए उसे दीदी कह कर ही पुकारती थी।

इलाएक बार कहा ना मितरा भूख नहीं है।

मितरापर दीदी

इला ग़ुस्से सेजाओ यँहा से। और जब तक मैं ना बुलाऊँ इस कक्ष में मत आना।

मितरा मन उदास कर वैष्णवी को साथ ले कर कमरे से बाहर चली गई। वैष्णवी ने जातेजाते इला की तरफ़ मूड कर देखा। इला के चहरे पर एक अजीब सा भाव था। उसके चहरे में डर के साथ चिंता की लकीरें भी खिंची हुई थी।

रात का अँधेरा पूरे नगर को घेर चुका था। आज चाँद देव अपने तारों की टोली को ले कर शायद कँही दूर टहलने के लिए चले गए थे। आज की रात किसी कोयल से भी काली थी। इला नींद में खो चुकी थी। उस ठंडी रात में अचानक उसके शरीर को गरमाहाट मिलने लगी थी। शुरूवात में अच्छा लगा पर जल्द ही उस गरमाहाट से उसके शरीर को एक त्रिव जलन होने लगी थी। और वो चीख़ फिर से सुनाई दी। वह झट से उठ बैठी। उसके बिस्तर के सामने, कमरे के बीचों बीच वह जलती औरत खड़ी थी। वो तिल मिला रही थी। चीख़ रही थी।मदद के लिए पुकार रही थी। इला का शरीर हरकतें करने लगा था। उसने बहुत कोशिश की हिलने की पर उसका शरीर टस से मस नहीं हो रहा था। वो अंदर ही अंदर छटपटाने लगी थी।

अचानक उस औरत की चीख़ बंद हो गई और उसने इला की तरफ़ हाँथ बड़ा कर कुछ कहा। उसने पूरा वाक्य नहीं बस एक शब्द कहा था। जो इला को ठीक से सुनाई नहीं दिया था। इला का झटपटाना बंद हो गया और  ध्यान से उसने अग्नि में धधकती उस औरत की तरफ़ देखा। उसका चहरा कुछ जाना पहचाना सा था। कौन थी वो? उस औरत ने फिर से कुछ कहा, इला ने इस बार उस शब्द को समझ लिया था। वो शब्द थामाँ इला सहम गई उसने पूरा ज़ोर लगा कर उस औरत के चहरे को टटोलने की कोशिश किया। उसके चहरे से लौ थोरी कम होने लगी थी। चहरा साफ़ दिखाई देने लगा था। वह चहरा किसी और का नहीं बल्कि उसकी ही बेटी का था। यह वही चहरा था जिसकी कल्पना इला अपनी बेटी के जवान होने पर करती थी। इला उसे देखते ही ज़ोर से चीख़ी और एक झटके से अपनी आँखे खोली। इला की नींद खुल चुकी थी। इला का शरीर बिस्तर पर लेटा हुआ था। बिस्तर पसीने से भीग चुका था। किंतु शरीर ठंडा पड़ गया था। उसने साँस भरते हुए अपनी बेटी की तरफ़ देखा। जो इला की साड़ी के आँचल के नीचे चैन से सो रही थी।

इला ने बिस्तर की दूसरी तरफ़ अपने पति को टटोला। पर उनका बिस्तर वैसा ही सज़ा हुआ था उसमें सिल्वट के एक भी निशान नहीं थे।अब तक नहीं आए। इतनी देर तो कभी नहीं करते ये।यही सोच के साथ वो अपने बिस्तर से उतर बाहर की ओर गई। उसका घर कई दियों की लौ से जगमगा रहा था। किंतु उसे अब इन दियों की लौ से भी डर लगने लगा था। उसने ख़ुद को मितरा के कमरे की ओर धकेला। वो दरवाज़ा खटखटाने ही वाली थी कि उसे बग़ल के कमरे में कुछ हरकत होने का आभास हुआ। वो उस कमरे की तरफ़ बड़ी। जिसके दरवाज़े के पल्लों की दरार से रोशनी बच कर बाहर निकलती दिखाई दे रही थी।

इला ने उस दरार से कमरे के भीतर झाँका। ब्रह्मानन्द, वैष्णवी के ऊपर लेटा हुआ था। वैष्णवी के हाँथ बिस्तर से बाहर निकल हवा में झूल रहे थे। उसकी कलई की काँच की चूड़ियाँ टूट कर बिस्तर के पास ज़मीन पर बिखरी हुई थी। वैष्णवी की बेजान आँखें बिना पलकें झपकाए एक टक कमरे की छत को देख रही थी। इला की आँख से फिर पानी टपकने को था कि तभी उसे उसकी बेटी के रोने की आवाज़ आइ।और वो चुपचाप अपने कमरे की तरफ़ लौट गई

सूर्य देव फिर क्षितिज पर चमकने लगे थे। किंतु एक नारी की अर्चना से वो आज वंचित थे। इला ने अपनी बेटी को दूध पिला कर झूले में सुला दिया था। वो रात की बात भूली नहीं थी पर उसे अनदेखा करने की कोशिश कर रही थी। बस एक डर था कि वह अब वैष्णवी का सामान कैसे करेगी। इस बीते एक दिन में उसने बहुत कुछ देख लिया था। वह अब पहली सी समान्य नहीं रही थी। वो चीख़ तो सुनाई दे ही रही थी उसे पर वैष्णवी की वो बेजान आँखें भी अब उसे बेचैन करने लगी थी। वो साहस कर रसोई की तरफ़ जा रही थी कि उसे कुछ आदमियों की आवाज़ घर के बड़े से कमरे से आती हुई सुनाई दी। उसने कमरे के अंदर झाँका। इला के पति, मुख्य पुरोहित अपने आसान में बैठे हुए थे। पंडितों की एक टोली उनके सामने दोनो तरफ़ रखे आसनो में विराजमान थी।

पंडित जानकी चरण जो उन सब पंडितों में सबसे वृद्ध थे, ने कहापिछले चार बरस से वर्षा ना होने की वजह से सूखा फेल रहा है। कई नगरवाशीयों की मृत्यु हो चुकी है। निम्न वर्ग के लोगों की संख्या इसमें ज़्यादा है किंतु असल समस्या ये है कि व्यापारी इस स्थान हो छोड़ कर कँही और जाने की बात कर रहे हैं। और बाहर के व्यापारियों ने यँहा आना इस लिए बंद कर दिया है कि उनके जानवरों के लिए पर्याप्त पानी नहीं है। यह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

पंडित दिव्यकुमार जो उम्र में सबसे छोटे थे ने कहामहोदय, गोदावरी का पानी अब सूखने लगा है। फ़सल के लिए भी पर्याप्त पानी ना मिलने की वजह से किसान भी परेसन है। उनका भी मन किसी और तट किनारे जा बसने का हो रहा है।

जानकी चरणइस समस्या का कुछ समाधान करना अनिवार्य हो गया है। वरना राजा इला के बसाए इस नगर को उजड़ने में समय नहीं लगेगा।

सभी पंडितों ने भी जानकी चरण के साथ हामी भरी की कुछ उपाय तो अब करना ही पड़ेगा

ब्रह्मानंद ने कुछ देर सोचने के बाद कहाशायद इंद्र देव हमसे क्रोधित है। हमें उन्हें प्रसन्न करने के लिए एक यज्ञ करना चाहिए।

सभी लोग ध्यान से उनकी बात सुन रहे थे। उन्होंने आगे कहाइंद्र को प्रसन्न कर हमें माँ दुर्गा को बलि भी देनी होगी। बलि किसी कन्या की होनी चाहिए। तभी नगर को सूखे की चपेट से बचाया जा सकता है।

क्यों युगों से देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि दी जाती है। क्यों अपने स्वार्थ की सिध्दी के लिए ये समाज कभी किसी बेज़ुबान जानवर की तो कभी किसी इंसान की जीवन लीला समाप्त कर देता है। ये प्रथाएँ शुरू करने वाला कौन है? उसे इस ज्ञान की प्राप्ति कँहा से हुई? इन सब सवालों के साथ वह वँही खड़ी उन विद्वानों की बातें सुन रही थी।

जानकी चरणयज्ञ की तैयारियाँ तो हो जायगी पर आहुति के लिए कन्या कँहा से लाया जाय ? कौन तैयार होगा इस पुण्य काम से लिए ?”

ब्रह्मानंदकिसी भी शुद्र का बच्चा ले आओ। जो बहुत ग़रीब हो। उसे थोड़ा चाँदी दे कर मना लेना।

सभी ने उनकी बात पर सहमति जाता दी।

ब्रह्मानंदऔर

इससे पहले की वो और के आगे कह पाते। इला ने उनकी गोध में अपनी तीन साल की बेटी को रख दिया।

ब्रह्मानंदयह क्या कर रही हो इला?”

इलासूखे से बचने के लिए किसी बच्चे की बलि देनी है ना? जो कन्या हो।तो हमारी बेटी की बलि क्यों नहीं देते?”

इला की बात सुन कमरे में बैठे सारे पंडित सन से रह गए। ब्रह्मानन्द ने चीड़ कर कहायह क्या बोल रही हो तुम।

इला आवाज़ नीचे रखते हुएक्यों यह तो एक पुण्य का काम है। नगर और नगरवाशीयों के जीवन का विषय है। फिर नगर के मुख्य प्रोहित का कर्तव्य सबसे बड़ा है। तो उन्हें ही अपने संतान की आहुति देनी चाहिए। मैंने ठीक कहा ना?”

ब्रह्मानन्द के पास इला के सवाल का कोई जवाब नहीं था। सारे पंडित एक दूसरे के चहरों को देखने लगे।

इलाबलि सिर्फ़ कन्या या नारी की ही क्यों? किसी बालक या पुरुष की भी दी जा सकती है। देवताओं की लिए तो पुरुष और नारी एक सामान ही है। है ना पंडित जानकी चरण?” और उसने जानकी चरण की तरफ़ पलट के देखा। जानकी चरण ने अपनी नज़र इला से हटा ब्रह्मानन्द की ओर घुमाया।

इला जानकी चरण सेमैंने आपसे कुछ पूछा है पंडित जी

जानकी चरणयह रीत सदियों से चली रही है।

इलायह रीत बनाई किसने? उस देवता ने, क्या उसने कहा की बालक नहीं बालिका की बलि मुझे चाहिए? बालक या बालिका तो छोड़िए क्या उसने कभी बलि भी माँगी है। क्या राम के कहा था या कृष्ण ने ? वो तो देवरूप थे ना? अरे ईश्वर जो ख़ुद जीवन देने वाला है। आप लोग उसी के दिए इस जीवन की बलि दे उसे प्रसन्न करना चाहते हैं ?”

ब्रह्मानन्द ने ऊँची आवाज़ दे मितरा को पुकारा। मितरा दौड़ते हुए कमरे के भीतर आ गई। ब्रह्मानन्द ने उसे इला को अपने कमरे में ले जाने का आदेश दिया। मितरा इला की तरफ़ बढ़ी। पर इला ने अपना एक हाँथ उठा मितरा को वँही रोक दिया।

और कहाकैसी ये रीत है जिसमें अधर्म सिर्फ़ नारी के साथ होता है। क्यों पति की मृत्यु के बाद उसकी चिता में उसकी पत्नी को जीवित जला दिया जाता है। और जब वह उस जलती चिता से बाहर कूदने की कोशिश करती है तो समाज उसे इन खोखले रीति रिवाजों के बने डंडे से फिर अंदर ढकेल देता हैं।क्यों?” यह कहते हुए इला के आँखों में भी अग्नि भड़कने लगी।

ब्रह्मानन्द ने उस अग्नि से झुलझते हुए अपने बचाव में कहाभला पति के बाद पत्नी का इस धरती में क्या काम। किसके सहारे जीवित रहेगी वो।

इला ने चीख़ते हुए तर्क कियातो फिर पत्नी की मृत्यु के बाद पति का भी क्या काम है? उसे भी पत्नी की चिता में ज़िंदा जला देना चाहिए।यह सुन कमरे में हलचल सी मच गई।

इला शब्दों में व्यंग लाते हुएहाँ पर मैं तो भूल गई थी। कि पति पत्नी के जीवित रहते हुए भी दूसरी नारी के शरीर को छू सकता है। चाहे वह शरीर उससे आधी उम्र की एक कन्या का ही क्यों ना हो? क्यों ब्रह्मानन्द जी?”

ब्रह्मानन्द इला की बात सुन छेपते हुएव्यर्थ का तर्क वितर्क मत करो इला।

इला करुण भरी आवाज़ सेव्यर्थ! क्या नारी का जीवन व्यर्थ है?” उसकी नज़र दरवाज़े के पास खड़ी वैष्णवी पर पड़ी। उसकी आँखें अब तक बेजान थी। वैष्णवी के पीछे वो जलती औरत भी इला को दिखाई दी। और उन दोनो की लाचार आँखों को देख इला की भवें तन गई। आँखों में जैसे ख़ून उतार गया था उसके और उसकी गरजती हुई आवाज़ निकलीअरे मूर्खोंआवाज़ में दुर्गा के शेर की दहाड़ थी। हर कोई एक बार के लिए ही सही पर सहम गया था।

पंजा मरते हुए उसने कहाहर ग्रंथ में लिखा है कि नारी और पुरुष को सामान अधिकार है। पर तुम जैसे पाखण्डी पंडित भगवान का डर दिखा धर्म को तोड़ मरोड़ कर अपने स्वार्थ के लिए धर्म के नाम पर मनमानी करते फिरते हो। नारी को व्यर्थ समझते हो। अगर एक पत्नी अपने पति के साथ चिता में जलेगी तो एक पति को भी अपनी पत्नी की चिता में जलना होगा। अगर पत्नी के रहते पुरुष अपनी काम भूख किसी पराई नारी के साथ मिटा सकता है। तो फिर पति की मृत्यु के बाद पत्नी किसी और पुरुष का सहारा ले जीवन फिर से शुरू क्यों नहीं कर सकती? कन्या की बलि के साथ बालक की बलि भी देनी होगी। तुम्हारे अनुसार ब्राह्मण के हाँथ से लगा भोग भगवान को अधिक प्रिय है। इसलिए बलि के लिए चुना हुआ बच्चा किसी शुद्र का नहीं बल्कि पंडित का ही होना चाहिए। और तुम्हें क्या लगता है कि बस बालक से ही वंश बनता है। क्या तुम सभी अपने पिता की नाल से बँधे थे? या फिर अपनी माँ की? ”

अरे तुम जैसे लोगों से बना इस समाज ने तो उस युग में भी बस नारियों के साथ ही भेदभाव और अत्याचार किया है। जिस युग में स्वयं भगवान धरती पर मनुष्य बन आए थे। बस सीता ही क्यों अग्नि में उतरे, राम क्यों नहीं। अगर कृष्ण तीन हज़ार रानी रख सकते है तो रुक्मणी तीन हज़ार पति क्यों नहीं रख सकती?

ब्रह्मानंद ग़ुस्से से अपना आसन छोड़ उठ गया अपनी बेटी को मितरा के हाथों में दे कर इला को कमरे के द्वार तक खिंचते हुए कहा अपनी ये बेबुनियाद बातें बंद करो। धर्म के अनुसार ही हम आचरण कर रहे हैं। हमें एक नारी से धर्म का पाठ सिखने की ज़रूरत नहीं है।और इला को धक्का दे दिया। वो फ़र्श पर जा गिरी इला करुण कंठ सेअगर यही धर्म है तो बदल दीजिए इस धर्म हो। जला दीजिए उन सारे ग्रंथों को। जिसमें सारे रीति रिवाज बस स्त्री पर अत्याचार करने के लिए ही बने और पुरुष को सर्वोतम बनाने के लिए। मान लो कहना वरना आने वाले कल में नारी की स्थिति और दयनी हो जायगी। उनके अधिकार छिन लिए जाएँगे। वह एक वस्तु बन कर रह जायगीऔर यह समाज पुरुष प्रधान हो कर आप जैसे ही मन मानी करता रहेगा। उस युग में भी नारी अग्नि में जलेगी। बचा लो आने वाली युग में नारी के जीवन को।

ब्रह्मानन्द इला की बात अनसुनी कर कमरे से बाहर की तरफ़ निकल पड़ा। उनकी मंडली भी उनके पीछेपीछे चल पड़ी इला फ़र्श पर पड़ी बिलखने लगी।

मितरा ने अपनी डबडबाई आँखों से उसकी गोध में बिलखती उस तीन साल की बच्ची की तरफ़ देख।

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