ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
“बूढ़े बाबा की अलमरी “

“बूढ़े बाबा की अलमरी “

एक अलमरी थी,
एक बूढ़े बाबा की पुरानी सी,
मकान के एक कमरे में,
वो सजी हुई रखी थी,
पहली तनखा की वो कहानी थी…

कभी वो जवान हुआ करती थी,
गोद में छुप कर उसकी,
बच्चों की हँसियाँ गूंजा करती थी,
कपड़ों, पैसों, ज़मीन के काग़ज़ों,
की वो करती निगरानी थी…

वक़्त गुज़रता गया,
कपड़ों का रंग ढल गया,
ज़मीन, पैसे काग़ज़ी सब बट गया,
बच्चे बूढ़े के अब नई अलमरी लिए,
अपने अपने नए घर को सज़ा लिया …

शरीर जो उसका ढल चुका था,
दिमक अब उसकी गोद में लग चुका था,
बाबा के साथ वो भी किसी के हिस्से में ना थी,
कमरे के कोने में पड़ी वो अकेली,
बस तन्हाई उसके खाली खानो में आइ थी…

एक अलमरी थी,
एक बूढ़े बाबा की वो कहानी थी।

Recycled Cupboard

बूढ़े बाबा, हिंदी कविता, shailism
shailism

बूढ़े बाबा, हिंदी कविता, shailism

 

बूढ़े बाबा, हिंदी कविता, shailism

Leave a Reply

Close Menu
%d bloggers like this: