ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
दुर्योधन को श्री कृष्ण ने बताया युद्ध विजयी होने का रहस्य- महाभारत कथा
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दुर्योधन को श्री कृष्ण ने बताया युद्ध विजयी होने का रहस्य- महाभारत कथा

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। दुर्योधन (सूर्योधन) मृत्यु संया पर लेटा हुआ था। उसने श्री कृष्ण को अपने समीप आते हुए देखा। दुर्योधन को क्रोध तो नहीं आया पर उसने कुछ ताने कृष्ण को ज़रूर मारे। कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

जब वो शांत हो गया तब उसने श्री कृष्ण से पूछा “वाशुदेव मेरी सेना शक्ति पांडवों की सेना शक्ति से कंही ज़्यादा थी। यँहा तक कि स्वयं श्री कृष्ण की नारायणी सेना मेरे पक्ष से लड़ी थी। मेरी सेना में एक से बड़ कर एक महारथी थे। फिर क्यों मैं यह युद्ध हार गया? मुझसे ऐसी कौन सी गलती हुई?”

कृष्ण ने कहा “तुमने सेनापति का पद सबसे पहले महात्मा भीष्म को दिया। फिर गुरु द्रोण सेनापति बने और अंत में महारथी कर्ण। यह बात सत्य है की यह सारे युद्ध कौशल में निपूर्ण और महान योद्धा थे। पर तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था जिससे लड़ने का सामर्थ्य मुझमें भी नहीं था।

वह था अश्वत्थामा।

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श्री कृष्ण की यह बात सुन दुर्योधन (सूर्योधन) चकित हो गया। कृष्ण ने कहा “ जन्म से ही अमर अश्वत्थामा में स्वयं भगवान शिव के ग्यारह रूद्र का तेज़ था। तुम्हें बस उसे जागृत करना था। अश्वत्थामा के मस्तक में जो मणि विद्यमान थी। वह उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय और सुरक्षित रखती थी। इस मणि के कारण ही उस पर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का असर नहीं हो पाता था। गुरु द्रोण के आलवा अश्वत्थामा ने भगवान परशुराम, कृपाचार्य, महर्षि वेदव्यास और पितमाह भीष्म से शिक्षा प्राप्त की थी। वह मेरी ही तरह 64 कलाओं और 18 विध्याओं में निपूर्ण था। अगर तुमने उसके मन में पांडवों के प्रति और क्रोध डाला होता और उसे सेनापति बनाया होता तो तुम आज अवश्य विजय होते।” 

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#अश्वत्थामा को दुर्योधन ने अंतिम दिन में सेनापति बनाया था। अश्वत्थामा के सेना मैं बस दो ही योद्धा शेष रह गए थे, कृपाचार्य और कृतवरमा। अश्वत्थामा ने इन दोनो के साथ पांडवों की बची सारी सेनाओं को मार गिराया था। और पांडवों के पाँच पुत्रों को भी पांडव समझ उसने मार दिया था। 

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#महाभारत के युद्ध में एक समय ऐसा आता है जब राक्षसो की सेना घटोत्कच के नेतृत्व में भयानक आक्रमण किया तो सभी कौरव वीर भाग खड़े, तब अकेले ही अश्वत्थामा वहाँ अड़े रहे। उन्होंने घटोत्कच के पुत्र अंजनपर्वा को मार डाला। साथ ही उन्होंने पांडवो की एक अक्षौहिणी सेना को भी मार डाला घटोत्कच को भी घायल कर दिया। उसके अतिरिक्त द्रुपद, शत्रुंजय, बलानीक, जयाश्व तथा राजा श्रुताहु को भी मार डाला था। उन्होंने कुन्तिभोज के दस पुत्रो को वध किया।

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