ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
दानवीर-लघु कथा
Painting by R Aziz

दानवीर-लघु कथा

लघु कथा by Shailism 

भरी धूप का वक़्त था एक कच्ची सड़क के किनारे एक पेड़ की छांव में एक आदमी बैठा थाउसने सर पर एक मटमेला कपड़ा बाँध रखा था। आँख और गाल अंदर धँसें हुए थे। गर्दन की नसें साफ़ दिखाई दे रही थी। कंधे झुके हुए थे उसके। छाती के ढाँचे की हड़ियाँ गिनी जा सकती थी। कोई ग़रीब था। जिसे भर पेट खाना भी नसीब नहीं था।

उसने अपने गंदे से झोले से एक कपड़ा निकला, जो लपटा हुआ थाउसमें एक रोटी और एक प्याज़ का टुकड़ा था। वह रोटी खाने ही वाला था कि ना जाने कँहा से एक कुत्ता आ गया। धूल में लिपटा हुआ पूरा गंदा था वह। ग़रीब ने आधी रोटी तोड़ कर उसे दे दिया। छांव में बैठे दोनो अपनी आधी-आधी रोटी खाने लगे।

उसी सड़क में से गुज़रते दो राहगीरों में से एक ने कहा। “आज सुबह जिंदल सेट ने लाखों का मुकुट और बंशी श्री हरी को चढ़ाया है।”

दूसरा रहगिर “सुना है उसने कई किसानो की ज़मीने हड़प ली है। और उस पर फ़ैक्टरी बना रहा है।”

पहला “क्या पता! खरे सोने का मुकुट है। और बंशी में तो कई अनमोल रतन जड़े हुए है। सेठ बहुत बड़ा दानवीर है।”

ग़रीब ने तो नहीं पर उस कुत्ते ने उनकी बात सुन लि। उसने हाँफते हुए सर घुमा कर ग़रीब की तरफ़ देखा। उसका अन्नदाता पत्तों को जोड़ कर एक प्याला बना रहा था। प्याला बनते ही उसने उसे कुत्ते के सामने रख दिया। और अपने हिस्से का थोरा पानी उसमें डाल दिया।

यह उस कुत्ते और ग़रीब की पहली मुलाक़ात थी।कुत्ता झट से उठा और उन दोनो राहगीरों की तरफ़ भोकने लगा। शायद अपनी ज़ुबान में वो उनसे कुछ कह रहा था।

This Post Has 2 Comments

    1. Thank you.

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