ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
युद्ध में अर्जुन का श्री कृष्ण पर क्रोध करना-महाभारत कथा

युद्ध में अर्जुन का श्री कृष्ण पर क्रोध करना-महाभारत कथा

जँहा क्षितिज पर सूर्य का प्रकाश फैला हुआ था वँही कुरुक्षेत्र की रणभूमि महारथी कर्ण से प्रकाशित हो रही थी। कर्ण सूर्य की किरणो से भी त्रिव अपने बाणों को अर्जुन की छाती के आरपार कर देना चाहता था यही इक्षा अर्जुन की कर्ण के प्रति थी दोनो योद्धा एक दूसरे से युद्ध करने की प्रतीक्षा में हमेशा व्याकुल रहते थे मानो दोनो के जीवन का यही एक मात्र उद्देश्य हो, एक दूसरे को युद्ध में परास्त करना किंतु श्री कृष्ण हमेशा अर्जुन को कर्ण से दूर रखने में सफल हो जाते फिर भी कई बार दोनो का आमानसामना हो जाया करता था

कर्ण और अर्जुन का युद्ध:

इस बार भी कर्ण और अर्जुन का सामना हो गया था। दोनो ही एक दूसरे पर बाणों की वर्षा कर रहे थे। जँहा कर्ण का रथ अर्जुन के बाणों के प्रभाव से कई कदम पीछे चला जाता तो वँही कर्ण के बाणों के प्रभाव से अर्जुन का रथ थोरा ही पीछे हट पाता था। किंतु जैसे ही अर्जुन का रथ पीछे हटता श्री कृष्ण कर्ण की प्रसंशा करने लगते। अर्जुन को कृष्ण का यह बर्ताव बहुत खलता किंतु वह बिना कुछ कहे फिर से युद्ध करने लगता था ।

एक बार फिर कृष्ण ने कर्ण की प्रसंशा की, इस बार अर्जुन स्वयं को रोक ना पाया और कृष्ण से कहा “माधव मेरे बाणों के वेग से कर्ण का रथ कई कदम पीछे चला जाता है तब आप मौन रहते है। किंतु कर्ण के बाणों से जब मेरा रथ तनिक भी हिलता है तो आप उसकी प्रसंशा करने लगते है। ऐसा क्यों, माधव?”

कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा “कर्ण के रथ की केवल एक ही विशेषता है कि उसमें स्वयं महारथी कर्ण विधमान है। किंतु तुम्हारे रथ में मेरे साथ स्वयं श्री हनुमान विधमान है। जिनके होते हुए इस रथ को तनिक भी हिला पाना सम्भव नहीं है।”

कृष्ण की यह बात सुन अर्जुन को बहुत लज्जा हुई। किंतु उसे कर्ण के सामर्थ्य का आभास भी हो गया।

महाभारत के बाद अर्जुन के रथ की दशा:

*महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडव की विजय हो चुकी थी। अर्जुन के रथ से उतरते ही श्री कृष्ण भी रथ की कमान छोड़ नीचे उतर गए। और ध्वज में बैठे श्री हनुमान को हाँथ जोड़ धन्यवाद किया। हनुमान के रथ छोड़ते ही वह चूर-चूर हो बिखर गया। श्री कृष्ण ने आश्चर्यचकित अर्जुन की ओर देख कर कहा “मेरे और श्री हनुमान के कारण ही यह रथ कर्ण और अन्य महारथियों के शस्त्रों के प्रभाव से अब तक सुरक्षित था। वरना इसकी यह दशा उसी दिन हो जाती जिस दिन कर्ण के बाणों की वर्षा इस पर हुई थी।” 

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