ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
अर्धनारीश्वर

अर्धनारीश्वर

           आज हवा का तेवर ज़रा अलग था। वह तेज़ी से मेरे घर की खिड़की की तरफ़ बड़ी और बिना दस्तक दिए कमरे में घुसते हुए सामने वाली दीवार से टकरा कर लौट गई। उसके वेग से दीवार पर लगी अर्धनारीश्वर की तस्वीर डोलने लगी। मैं सहारा देते हुए उस तस्वीर को स्थिर करने की कोशिश करने लगी। यह करते हुए मेरा पूरा ध्यान अर्धनारीश्वर के चित्र पर गया।

            वैसे तो इस तस्वीर को मैं पहले भी कई बार देख चुकी थी। पर अर्धनारीश्वर के इस आकार को मैंने जिस दृष्टि से आज देखा था, वह दृष्टि पहले से अलग थी। आधा शरीर शिव का तो आधा शक्ति का था। दोनो का माथे की चौड़ाई एक सी थी। आँखें, नाक और चहरे की बनावट भी एक सी थी। मानो जैसे चहरा एक ही व्यक्ति का था बस साजसजा अलग कर दी गई थी। यँहा तक की उनकी क़द काठी भी सामान ही थी। विलक्षण समानता थी दोनो में। उनके मुख मंडल का तेज़ भी एक समान था। और शांत मुस्कान भी एक सी थी। मैं तस्वीर को निहार ही रही थी कि ख़यालों का एक झोंका उसी हवा की तरह बिना दस्तक दिए मेरे मन के कमरे के भीतर पहुँचा और चारों कोनो से टकराने लगा।

         अर्धनारीश्वर की यह तस्वीर लगभग सभी घरों में ना केवल पाई जाती है, बल्कि पूजी भी जाती है। फिर भी क्यों बहुत से घरों में पुरुष और नारी को सामान दर्जा नहीं दिया जाता ? क्यों पुरुष के क़द को बड़ा और माथे के तेज़ को ही ज्ञान समझा जाता है। अगर पुरुष मेहनत से एकएक ईठ जोड़ कर मकान बनाता है, तो नारी अपने स्नेह से सींच कर उस मकान को घर बनाती है।

         क्या उस नारी को शारीरिक तोर पर मारना या मानसिक दुःख देना उचित है ? जो अपना सर्वत्र त्याग कर किसी दूसरे के घर परिवार को स्वयं का एक अभिन्नय हिस्सा बनाती है। उनके परिवार के वृक्ष को पहले से ज़्यादा घना और बड़ा बनाती है। मुझे तो तब और ज़्यादा ताज़ुब होता है जब एक सास अपनी बहु पर अत्याचार करने लगती है। मुझे तो उसके नारीत्व पर शंका होने लगती है। क्या एक नारी का यह उत्तरदायित्व नहीं कि वह दूसरी नारी के मानसम्मान की रक्षा करे ? पुरुष और नारी की समानता की बात तो दूर है। कई घरों में तो बेटी और बहु को एक सामान रूप से नहीं देखा जाता है। वह घर भी मुझे विचित्र लगता है। जँहा बेटी के अधिकार और सम्मान अलग और बहु के अलग होते हैं।

        हिंदुस्तान एक प्रग्रति शील देश है किंतु नारी के अधिकारों और सम्मान के विषय में अब तक पिछड़ा हुआ है। और इसका कारण यह है कि समाज हमेशा पुरुष प्रधान ही रहा है। यह दशा आज से नहीं बल्कि सदियों से रही है। पर पुरुष का अस्तित्व नारी के बिना कुछ भी नहीं है और इसमें कोई दो मत राय भी नहीं है। क्योंकि पुरुष की नाल नौ महीने तक उसकी माँ से जुड़ी होती है ना कि पिता से।

          मैं यह नहीं चाहती कि नारी का अधिकार या सम्मान किसी पुरुष से ज़्यादा हो किंतु उससे कम भी नहीं होना चाहिए। और ना ही मैं पुरुषार्थ को नीचा दिखाना चाहती हूँ। मैं तो बस यह चाहती हूँ कि किसी के भी द्वारा किसी भी स्थान पर ना तो नारीत्व को नीचा दिखाया जाए और ना ही नारी के अधिकार और सम्मान के साथ कोई पक्षपात किया जाए। समाज में और हर घर में, पुरुष और नारी को सामान दर्जा दिया जाए। और यह तभी पूर्ण रूप से सम्भव है जब पुरुष भी नारी के साथ इस के लिए आवाज़ उठाएगा। क्योंकि सती प्रथा को बंद करने वाली कोई नारी नहीं बल्कि एक पुरुष ही था। वह पुरुष जो स्त्रियों की भावनाओं को और उनके प्रति होने वाली अत्याचारों से मिले ज़ख़्मों के दर्द को भली भाती महसूस कर सकता था। अगर वह यह कर सकता था तो बाक़ी पुरुष क्यों नहीं?

         अर्धनारीश्वर की तस्वीर स्थिर हो चुकी थी। हवा लौट चुकी थी। किंतु यह सवाल अब तक मेरे मन मस्तिष्क में चक्रवात बन कर घूम रहा था कि क्या अर्धनारीश्वर इस तस्वीर तक ही सीमित रह जाएँगे या फिर साँस लेते हुए हर घर में पाए जाएँगे ?

                                                                                        by – शैल स्वर्णकार

 

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