ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
” मुझे मंज़ूर नहीं “

” मुझे मंज़ूर नहीं “

मैं बेजान ही सही,

पर तुमसा ज़िंदा,

होना मुझे मंज़ूर नहीं…

मैं पाताल ही सही,

पर तुमसा अभिमानी आकाश,

होना मुझे मंज़ूर नहीं…

मैं अँधेरा ही सही,

पर तुमसा मतलबी रोशन,

होना मुझे मंज़ूर नहीं…

मैं अकेला ही सही,

पर तुमसा मुखोंटा पहेन चार,

होना मुझे मंज़ूर नहीं…

मैं बेज़ुबान ही सही,

पर तुमसा झूठा,

होना मुझे मंज़ूर नहीं…

मेरा अंत ही सही,

पर तुमसा अमर,

होना मुझे मंज़ूर नहीं।

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