ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
“पांडवों के अलावा ‘द्रौपदी’ के मन में कोई और था – महाभारत कथा”
राजा रवि वर्मा पेंटिंग

“पांडवों के अलावा ‘द्रौपदी’ के मन में कोई और था – महाभारत कथा”

द्रौपदी की यह कथा “महाभारत” काल में उन दिनो की है जब वह पांडवों के साथ तेरह वर्षों का निर्वासन व्यतीत कर रही थी बारह वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास

लोक कथा के अनुसार

एक दिन द्रौपदी ने जामुन फल का एक गूछा कुछ ही ऊँचाई पर लटकते हुए देखा खाने की चाह से उसने उस गूछे को तोड़ लियागूछे को तोड़ते ही कृष्ण वँहा पहुँचे और द्रौपदी को उसे खाने से रोकते हुए कहा “ यह जामुन का गूछा जो तुमने तोड़ा है। इसे खाकर बारह वर्षों से तपस्या में लिन एक ऋषि अपना उपवास तोड़ने वाले थे। अगर इन फलों को उन्होंने इस पेड़ पर लगा हुआ नहीं पाया तो उनके ग़ुस्से का परिणाम तुम्हें और पांडवों को सहन करना होगा।”

द्रौपदी भयभीत हो कृष्ण से मदद माँगती है। तब कृष्ण कहते हैं ” सखी यह फलों का गूछा इस वृक्ष पर वापस लगाया जा सकता है।पर इसे वही लगा सकता है जिसने मन में कोई भी बात गुप्त ना रखी हो।” अब तक पांडव भी वँहा पहुँच चुके थे।

पाँचाली के पास अब कोई और रास्ता नहीं था। मन में छुपी बात उसे बताना ही पड़ेगा। ऋषि के क्रोध का प्रकोप पांडवों और उसके लिए और मुसीबतें खड़ी कर सकता था।

द्रौपदी “ मैंने अपने पाँचों पतियों को समान रूप से सम्मान और प्रेम किया है। किंतु इनके अलावा कोई और है। जिसके प्रति मेरे मन में सम्मान और स्नेह है। और वह है “कर्ण”। मैंने सूतपुत्र होने के नाते उन्हें स्वयंवर में भाग लेने से रोक दिया था। किंतु मेरा विवाह उनसे होता तो मैं जुआ में किसी वस्तु की तरह लगाई नहीं जाती। ना ही भरी सभा में मेरा अपमान होता और ना ही मैं वश्या कहलाती।”

कर्ण , महाभारत,
विमनिका कॉमिक्स

द्रौपदी की बात सुन पांडव को आघात हुआ। किंतु उन्होंने कुछ ना कहा। श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए द्रौपदी को संकेत दिया। द्रौपदी जामुन के गूछों को पेड़ की डाली के पास ले गई और वह फल पुनः पेड़ पर लग गए।

(यह लोक कथा “जंबुल आख्यान” के नाम से जंबुल अध्याय में लिखित है।)

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