ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
“बारिश”

“बारिश”

घर से निकलते ही,
यादों की जोरों से बारिश होने लगी,
मैंने छतरी साथ नहीं राखी थी,
पूरा ही भीग गया,
कुछ बुँदे मखमली चादर ओढ़े हुए थे,
तो कुछ काँटों से चुभे जिस्म को मेरे…

Leave a Reply

Close Menu
%d bloggers like this: