ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
“पापा (Father)”

“पापा (Father)”

नीला फ़्रॉक बसता पहने,

मैं रोती-रोती  घर पहुँची,

घुटना छिल चुका था मेरा,

दरवाज़ा खोल आवाज़ मैंने दी,

पापा-पापा देखो मैं गिर पड़ी,

प्रत्युत्तर में ख़ामोशी थी,

खारी बूँदे अब आँखो में थी,

घर में वो आज थे नहीं,

आग जंगल में थी लगी,

जलन जो मेरे घुटनो में थी,

अब मन में वो फ़ेल चुकी थी,

नाक सिकुड़ती रूठी सी मैं,

बिस्तर में जा कूदी थी,

पापा-पापा कहते मैं,

जाने कब सो चुकी थी,

आँखें मलते जब उठी,

हाँथों को मेरे एक हँथेली,

प्यार से सहला रही थी,

चमड़ी जली थी उसकी,

फफ़ोलों से वो उभर चुकी थी,

मगर घुटनो पर मेरे,

मलहम पट्टी बंधी थी,

जंगल की आग के साथ,

जलन मन की बुझ चुकी थी,

पर आँख अब भी मेरी,

खारे मोतीयों से सजी थी,

लग कर सिने से उनके,

मैं फिर सिसकियाँ लेने लगी थी।

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