ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
” पहचान पाये “

” पहचान पाये “

मकानों को टुटा बिखरा देखा है ?
खून के धब्बों से रंगी ज़मीन?
खम्बों पर लटकते अध नंगे शरीर?

देखा ज़रूर होगा, कई किस्से होते हैं ऐसे,
मज़हब के नाम पर कई मरते जलते रहते हैं.

पर कभी पहचान पाये?
उन टूटे मकानों की इट किस कौम की थी?
ज़मीन पर बिखरा ख़ून हरा था या भगवा?
खम्बों की तारों में उर्दू की अज़ान दौड़ती थी,
या फिर संस्कृत के श्लोक?

पहचान पाये कौन सा मज़हब था वो,
जो खम्बों में बेजान लटका हुआ था?

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