“जड़े”

उसने ज़मीन साफ़ कर खुद के माकन और दीवारे बनाली,
बिना सोचे ये की एक जान अब भी जमी है उसी ज़मीन में,
उस जान ने भी ज़िंदा रहने अपनी जड़े उनके पत्थरों की दीवार में गड़ा दी,
कुछ दर्रारे भी हो गई है अब उसके माकन में,
वो दोष फिर भी उसकी जड़ों को देता है कहता है ज़मीन हमारी है,
वो जान मुस्कुराता है, उसकी बात सुन याद करता है उन बरसों को,
जब यह माकन बनाने वाले के पिता बचपन में उसकी दंगल पर बैठ डूबता उगता सूरज देखा करते थे…

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