ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
“खामोशियाँ”

“खामोशियाँ”

दोनों काली मलमल ओढ़े,
एक पहाड़ की चोटी पर,
चुपचाप से बैठे थे…

शायद एक दूसरे की,
ख़ामोशी बाँट रहे थे…

एक की “ख़ामोशी” थक चुके ज़ख्मों की थी,
तो दूसरे उस चाँद की खुद पर लगे दाग़ की थी…

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