“इंतज़ार”

“आपके बेटे का कोई खत नहीं आया माँ जी “, डेस्क के पीछे बैठे एक आदमी ने कहा.
यह सुन वो अपनी मोतीया बिंद वाली नज़रों को निचे किये, लकड़ी के एक डण्डे का सहारा लिए कमज़ोर कदमों से बहार की तरफ लौट जाती है.
पास ही बैठे दूसरा आदमी “कौन है यह बुढ़िया रोज यँहा चली आती है ”
पहला आदमी ” रोशन ठाकुर की माँ है ”
दूसरा आदमी  “पर उसे शाहिद हुए तो बिस साल हो चुके हैं “

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